Saturday, 27 May 2017

Boycotted Saubhari Brahmans From Vrindavan (Vahishkaar)

वो काली रात जब, हुआ था हमारे पूर्वजों पर अत्याचार 

वृन्दावन “सौभरि ब्राह्मण समाज” का मूल निवास रहा है(सुनरख धाम ) क्योंकि हमारे वंशधर "ब्रह्मऋषि सौभरि जी" व् पूर्वजौं की तपस्थली थी | लेकिन एक घटना है जिसको सुनते ही आज भी दिल कम्पित हो उठता है, शायद हमारी युवा पीढ़ी इस "वाक़या" से अनभिज्ञ होगी | हम उसको काला दिवस नही कह सकते लेकिन वो भयंकर काली रात रही होगी| जब हमारी पांडित्यपूर्ण पराकाष्ठा चरम पर थी और ब्रज के लगभग सभी बड़े देवालयों के पुरोहित थे तब अचानक ही एक ऐसी अनहोनी हुई जिसने हमको देश के कोने -कोने में जाने को मजबूर कर दिया ।







वो कुछ इस तरह से है-
सन १३०० ई० के करीब बस एक छोटी सी बात नामंजूर करने पर नबाब ने, यह कह कर सौभरि ब्राह्मण समाज का बहिष्कार कर दिया, कि आप सोने की भी गाय नही काट सकते, शहर वृन्दावन को खाली करने का फरमान जारी कर दिया | जितने भी जाति संसार के पूजनीय और कर्मनिष्ठ थे उनको चिंता सताने लगी | रातों रात सलाह मशविरा किया, निष्कर्ष निकाला कि "काटने " से "भागना " बेहतर है और उसी क्षण अपनी जान बचाने की खातिर और अपने ‘ब्राह्मणत्व कि गरिमा’ को ध्यान रखते हुए, चलते बने । उसी रात अपने बच्चों और सामान के साथ निकल लिए ।अब इतनी बड़ी तादात, जाएं तो कहाँ जाएं, बुद्धजीवियों ने सोचा जिसको जहाँ-जहाँ जगह मिलती जाय वो वहीँ ठहर ते जाओ । फिर क्या था धीरे- धीरे रथों का टोला आगे बढ़ता गया और जिसको जैसी जगह मिली वह वहीँ बसता गया । इधर सैकड़ों परिवार हाथरस, अलीगढ और बरेली की तरफ निकल गए । उधर ये घटना भरतपुर नरेश को पता चला तो उसने अपने गुप्तचरो द्वारा कुछ ठिकाने दे दिए जहाँ वो रह सकें । इस तरीके से कबीलों की तरह बसते गए । कुछ लोगो को सुदूर भेज दिया गया। उस समय एक राज्य से दूसरे राज्य में घुसने के लिए अनुमति लेनी पड़ती थी|इसलिए कुछ राजा के द्वारा बतौर शरणार्थी, कुछ रात में सीमा लांघकर , परिवारों का जिम्मा भिंड मुरैना विरासतों ने संभाला और बाकि जबलपुर की तरफ बढ़ गए ।
कितनी यातनायें झेलने के बाद आज हम फिर से समृद्धि की ओर हैं ।

स्वजाति आबादी - ढाई लाख से ऊपर
संत, सती, हजारों इंजीनियर्स, टीचर्स, डॉक्टर्,  pwd ठेकेदार, हजारो से ज्यादा भारत सरकार के कर्मचारी, और करीब प्राथमिक रोजगार ‘खेती’ से आया हुआ करोड़ों रुपयों का टर्नओवर के मध्ये नजर अपने आसपास के इलाकों में सम्रद्धि की धाक जमाये हुए हैं ।

ऐसे कर्मनिष्ठ समाज को मेरा शत शत नमन ...


साभार: पंडित ओमन सौभरि भुर्रक, मथुरा (उत्तर प्रदेश) ।

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