Saturday, 27 May 2017

Dauji Temple, Baldeo (Mathura)

श्रीदाऊजीकामन्दिर: बलदेव / Dauji Temple: Baldev-


यहस्थान मथुरा जनपदमें ब्रजमंडल केपूर्वी छोर पर स्थितहै।मथुरासे 21 कि०मी०दूरीपर एटा-मथुरा मार्ग के मध्य में स्थितहै।मार्गकेबीचमें गोकुल एवं महावन जोकि पुराणों में वर्णित वृहद्वन केनामसेविख्यातहै, पड़तेहैं।यहस्थानपुराणोक्तविद्रुमवनकेनामसेनिर्दिष्टहै।इसीविद्रुभवनमेंभगवानश्री बलराम जीकी
अत्यन्तमनोहारी विशाल प्रतिमात थाउनकीसहधर्मिणीराजा कीपुत्रीज्योतिष्मती रेवती जी
काविग्रहहै।यहएकविशालकायदेवालयहैजोकिएकदुर्गकीभाँतिसुदृढप्राचीरोंसेआवेष्ठितहै।मन्दिरकेचारोंओरसर्पकीकुण्डलीकीभाँतिपरिक्रमामार्गमेंएकपूर्णपल्लवितबाज़ारहै।इस
मन्दिरकेचार मुख्य दरवाजे हैं, जो क्रमश: सिंहचौर, जनानीड्योढी, गोशालाद्वार या बड़वालेदरवाज़ेकेनामसेजानेजातेहैं।
मन्दिरकेपीछेएकविशालकुण्डहैजोकि बलभद्रकुण्ड केनामसेपुराणवर्णितहै।आजकल इसे क्षीरसागरकेनामसेपुकारतेहैं।

श्रीदाऊजीकीमूर्ति-
देवालय मेंपूर्वाभिमुख 2 फुटऊँचे संगमरमर के सिंहासन पर स्थापित है।पौराणिकआख्यानकेअनुसारभगवानश्री कृष्ण केपौत्र श्रीवज्रनाभ नेअपनेपूर्वजोंकीपुण्यस्मृति में तथा उनकेउपासनाक्रमकोसंस्थापितकरने हेतु 4 देवविग्रहतथा 4 देवियों की मूर्तियाँ निर्माण करस्थापित की थीं।जिनमेंसेश्रीबलदेवजीकायहीविग्रहहैजोकि द्वापरयुग केबादकालक्षेपसेभूमिस्थहोगयाथा।पुरातत्ववेत्ताओंकामतहैयहमूर्तिपूर्व कुषाण कालीनहैजिसकानिर्माणकाल 2 सहस्रयाइससेअधिकहोनाचाहिये।ब्रजमण्डल केप्राचीनदेवस्थानोंमेंयदिश्रीबलदेवजीविग्रहकोप्राचीनतमकहाजायतोकोईअत्युक्तिनहीं। ब्रज केअतिरिक्तशायदकहींइतनाविशाल वैष्णव श्रीविग्रहदर्शनकोमिले।यहमूर्तिक़रीब 8 फुटऊँचीएवंसाढेतीनफुटचौडीश्यामवर्णकीहै।पीछे शेषनाग सातफनोंसेयुक्तमुख्यमूर्तिकीछायाकरतेहैं।मूर्तिनृत्यमुद्रामेंहै, दाहिनाहाथ सिरसेऊपर वरद मुद्रा मेंहैएवं बाँये हाथ में चषकहै।विशालनेत्र, भुजाएं-भुजाओंमेंआभूषण, कलाईमेंकंडूलाउत्कीर्णितहैं।मुकटमेंबारीकनक्काशीकाआभासहोताहैपैरोंमेंभीआभूषणप्रतीतहोतेहैंतथाकटिप्रदेशमेंधोतीपहनेहुएहैंमूर्तिकेकानमेंएककुण्डलहैतथाकण्ठमेंवैजन्तीमालाउत्कीर्णितहैं।मूर्तिकेसिरकेऊपरसेलेकर चरणों तकशेषनाग स्थितहै।शेष केतीनवलयहैंजो किमूर्तिमेंस्पष्टदिखाईदेतेहैं।औरयोगशास्त्रकीकुण्डलिनीशक्तिकेप्रतीकरूप हैं क्योंकि पौराणिक मान्यता केअनुसार बलदेवजी शक्तिकेप्रतीकयोगएवंशिलाखण्डमेंस्पष्टदिखाईदेतीहैंजोकिसुबल, तोषएवं श्रीदामा सखाओंकीहैं।बलदेवजीकेसामनेदक्षिणभागमेंदोफुटऊँचेसिंहासनपररेवतीजीकीमूर्तिस्थापितहैंजोकिबलदेवजीकेचरणोन्मुखहैऔररेवतीजीकेपूर्णसेवा-भावकीप्रतीकहै।यहमूर्तिक़रीबपाँचफुटऊँचीहै।दाहिनाहाथवरदमुद्रामेंतथावामहस्तकटिप्रदेशकेपासस्थितहै।इसमूर्तिमेंहीसर्पवलयकाअंकनस्पष्टहै।दोनोंभुजाओंमें, कण्ठमें, चरणोंमेंआभूषणोंकाउत्कीर्णनहै।उन्मीलितनेत्रोंएवंउन्नतउरोजोंसेयुक्तविग्रहअत्यन्तशोभायमानलगताहैं।
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वैदिकधर्म -केप्रचारएवंअर्चनाकाआरम्भचर्तुव्यूहउपासनासेहोताहैजिसमेंसंकर्षणप्रधानहैं।ऐतिहासिक दृष्टिकोणसेदेखाजायतो ब्रजमण्डलकेप्राचीनतम देवता बलदेव हीहैं।सम्भवत: ब्रजमण्डलमेंबलदेवजी से प्राचीन कोई देव विग्रह नहीं।ऐतिहासिकप्रमाणोंमेंचित्तौड़केशिलालेखोंमेंजोकिईसासेपाँचवीशताब्दीपूर्वकेहैंबलदेवोपासनाएवंउनकेमन्दिरकोइंगितकियाहै।
अर्पटक, भोरगाँव नानाघटि का केशिला लेख जो कि ईसा केप्रथमद्वितीयशाताब्दीकेहैं, जुनसुठी की बलदेव मूर्ति शुंगकालीनहै
तथा यूनान के शासकअगाथोक्लीज कीचाँदीकी मुद्रा पर हलधारीबलराम की मूर्ति काअंकनसभी बलदेव जी कीपूजा उपासनाए वंजनमान्यओं केप्रतीकहैं।

मूर्तिकाप्राकट्य-

इस बलदेव मूर्तिकेप्राकट्यकाभीएकबहुतरोचकइतिहासहै।मध्ययुगकासमयथा मुग़ल साम्राज्य का प्रतिष्ठा सूर्य मध्यान्ह में था। अकबर अपनेभारीश्रम, बुद्धिचातुर्यएवंयुद्धकौशलसेएकऐसीसल्तनतकीप्राचीरकेनिर्माणमेंरतथाजोकिउसकेकल्पनालोककीमान्यता केअनुसारक भी न ढहेऔरपीढी-दर-पीढी मुग़लिया ख़ानदान हिन्दुस्तानकी सरज़मीं परनिष्कंटकअपनीसल्तनतको क़ायम रखकरगद्दीएवंताजकाउपभोगकरतेरहे।एकओरयहमुग़लों कीस्थापना कासमय था दूसरीओरमध्ययुगीन धर्माचार्य एवंसन्तों केअवतरण तथाअभ्युदय का स्वर्णयुग।
ब्रजमण्डल मेंतत्कालीन धर्माचार्यों में महाप्रभु बल्लभाचार्य, श्री निम्बकाचार्य एवं चैतन्य संप्रदाय कीमान्यताएं अत्यन्त लोकप्रिय थीं।किसीसमय गोवर्धन कीतलहटी में एक बहुतप्राचीनतीर्थ-स्थल सूर्यकुण्ड एवंउसका तटवर्ती ग्राम भरना-खुर्द (छोटाभरना) था
।इसीसूर्यकुण्डकेघाटपर परमसात्विकब्राह्मणवंशावतंशगोस्वामीकल्याणदेवाचार्य तपस्याकरतेथे।उनकाजन्मभीइसीग्राममेंइभयरामजीकेघरमेंहुआथा।वेवंश-तंशश्रीबलदेवजीकेअनन्यअर्चकथे।
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एकदिन श्रीकल्याण-देवजी कोऐसीअनुभूतिहुईकिउनकाअन्तर्मनतीर्थाटनकाआदेशदेरहाहै।कुछसमययों-हीबितायाकिन्तुस्फुरणाबलवतीहीहोतीजाती।अत: कल्याण-देवजीनेजगदीशयात्राकानिश्चयकरघरसेप्रस्थानकरदियाश्री गिर्राजपरिक्रमा कर मानसीगंगा स्नानकियाऔरफिरपहुँचेमथुरा, यमुना स्नान, दर्शनकरआगेबढ़ेऔरपहुँचेविद्रुमवनजहाँआजकावर्तमानबल्देवनगरहै।यहाँरात्रिविश्रामकिया।सघनवट-वृक्षोंकीछायातथासरोवरकाकिनारायेदोनोंस्थितियाँउनकोरमीं।फलत: कुछदिनयहींतपकरनेकानिश्चयकिया।एकदिनअपनेआन्हिककर्मसेनिवृतहुयेहीथेकिदिव्यहल-मूसलधारीभगवानश्रीबलरामउनकेसम्मुखप्रकटहुयेतथाबोलेकिमैंतुम्हारीतपस्यासेप्रसन्नहूँ, वरमाँगो।कल्याण-देवजीनेकरबद्धप्रणामकरनिवेदनकियाकिप्रभुआपकेनित्यदर्शनकेअतिरिक्तमुझेकुछभीअभीष्टनहींहैं।अत: आपनित्यमेरेघरविराजें।बलदेवजीनेतथास्तुकहकरस्वीकृतिदीऔरअन्तर्धानहोगये।साथहीयहभीआदेशकियाकि 'जिसप्रयोजनहेतुजगदीशयात्राकररहेहो, वेसभीफलतुम्हेंयहींमिलेंगे, इसहेतुइसीवट-वृक्षकेनीचेमेरीएवंश्रीरेवतीकीप्रतिमाएंभूमिस्थहैं, उनकाप्राकट्यकरो'।अबतोकल्याण-देवजीकीव्यग्रताबढगईऔरजुटगयेभूमिकेखोदनेमें, जिसस्थानकाआदेशश्रीबलराम|दाऊजीनेकियाथा।
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इधरएकऔरविचित्रआख्यानउपस्थितहुआकिजिसदिन श्रीकल्याण-देवजी कोसाक्षात्कारहुआउसीपूर्वरात्रिकोगोकुलमेंश्रीमद्बल्लभाचार्यमहाप्रभुकेपौत्रगोस्वामीगोकुलनाथजीकोस्वप्नहुआकि 'जोश्यामागौकेबारेमेंआपचिन्तितहैंवहनित्यदूधमेरीप्रतिमाऊपरस्त्रवितकरदेतीहै।ग्वालानिर्दोषहै।मेरीप्रतिमाएंविद्रुमवनमेंवट-वृक्षकेनीचेभूमिस्थहैंप्राकट्यकराओ ' यहश्यामागौसद्य: प्रसूताहोनेकेबावजूददूधनहींदेतीथी।महाराजश्रीकोदूधकेबारेग्वालाकेऊपरसन्देहहोताथा।प्रभुकीआज्ञासेगोस्वामीजीनेउपर्युक्तस्थलपरजानेकानिर्णयकिया।वहाँजाकरदेखाकिश्रीकल्याण-देवजीमूर्तियुगलकोभूमिसेखोदकरनिकालचुकेहैं।वहाँपहुँचनमस्कारअभिवादनकेउपरान्तदोनोंनेअपने-अपनेवृतान्तसुनाये।अत्यन्तहर्षविह्वलधर्माचार्यहृदयकोविग्रहोंकेस्थापनकेनिर्णयकीचिन्ताहुईऔरनिश्चयकियाकिइसघोरजंगलसेमूर्तिद्वयकोहटाकरक्योंनश्री गोकुल मेंप्रतिष्ठितकियाजाय।एतदर्थअनेकगाढ़ामँगायेकिन्तुमूर्तिअपनेस्थानसे, कहतेहैंकिचौबीसबैलऔरअनेकव्यक्तियोंकेद्वाराहटायेजानेपरभी, टससेमसनहुईऔरइतनाश्रमव्यर्थगया।हारमानकरयहीनिश्चयकियागयाकिदोनोंमूर्तियोंकोअपनेप्राकट्यकेस्थानपरहीप्रतिष्ठितकरदियाजाय।अत: जहाँ श्रीकल्याण-देव तपस्याकरतेथेउसीपर्णकुटीमेंसर्वप्रथमस्थापनाहुईजिसकेद्वाराकल्याणदेवजीकोनित्यघरमेंनिवासकरनेकादियागया, वरदानसफलहुआ।
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यहदिनसंयोगत: मार्गशीर्ष मासकीपूर्णमासीथी।षोडसोपचारक्रमसेवेदाचारकेअनुरूपदोनोंमूर्तियोंकीअर्चनाकोगईतथासर्वप्रथमश्रीठाकुरजीकोखीरकाभोगरखागया, अत: उसदिनसेलेकरआजपर्यन्तप्रतिदिनखीरभोगमेंअवश्यआतीहै।गोस्वामीगोकुलनाथजी ने एक नवीन मंदिर के निर्माण का भार वहन करने का संकल्प लिया
तथा पूजाअर्चनाका भार
उस दिनसे अद्यावधि कल्याण वंशज ही श्रीठाकुरजी की पूजाअर्चनाकरतेआरहे हैं यह दिनमार्गशीर्ष पूर्णिमासम्वत् 1638 विक्रमथा।एक वर्ष केभीतर पुन: दोनों मूर्तियों को पर्णकुटी से हटाकरश्रीगोस्वामीमहाराज श्रीकेनव-निर्मित देवालय में, जोकिसम्पूर्णसुविधाओं से युक्त था, मार्गशीर्षपूर्णिमा संवत 1639 कोप्रतिष्ठितकरदियागया।यहस्थानकहतेहैंभगवानबलरामकीजन्म-स्थलीएवंनित्यक्रीड़ास्थलीहैपौराणिकआख्यानकेअनुसारयहस्थाननन्दबाबाकेअधिकारक्षेत्रमेंथा।यहाँबाबा की गौ केनिवास केलियेबड़े-बड़े खिरक निर्मितथे।
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मगधराज जरासंध केराज्यकीपश्चिमीसीमायहाँलगतीथीं, अत: यहक्षेत्रकंसकेआतंकसेप्राय: सुरक्षितथा।इसीनिमित्तनन्दबाबा नेबलदेवजीकीमातारोहिणीकोबलदेवजीकेप्रसवकेनिमितइसीविद्रुमवनमेंरखाथाऔरयहींबलदेवजीकाजन्महुआजिसकेप्रतीकरूपरीढ़ा (रोहिणेयकग्रामकाअपभ्रंशतथाअबैरनी, बैररहितक्षेत्र) दोनोंग्रामआजतकमौजूदहैं।
धीरेधीरेसमयबीतगयाबलदेवजीकीख्यातिएवंवैभवनिरन्तरबढ़तागयाऔरसमयआगयाधर्माद्वेषीशंहशाह औरंगजेबका।जिसकामात्रसंकल्पसमस्तहिन्दूदेवी-देवताओंकीमूर्तिभंजनएवंदेवस्थानकोनष्ट-भ्रष्टकरनाथा।मथुराके केशवदेवमन्दिरएवं महावन केप्राचीनतमदेवस्थानोंकोनष्ट-भ्रष्टकरताआगेबढातोउसनेबलदेव।जीकीख्यातिसुनीवनिश्चयकियाकिक्योंनइसमूर्तिकोतोड़दियाजाय।फलत: मूर्तिभंजनीसेनाकोलेकरआगेबढ़ा।कहतेहैंकिसेनानिरन्तरचलतीरहीजहाँभीपहुँचतेबलदेवकीदूरीपूछनेपरदोकोसहीबताईजातीजिससेउसनेसमझाकिनिश्चयहीबल्देवकोईचमत्कारीदेवविग्रहहै, किन्तुअधमोन्मार्द्धसेनालेकरबढ़ताहीचलागयाजिसकेपरिणाम-स्वरूपकहतेहैंकिभौरोंऔरततइयों (बेर्रा) काएकभारीझुण्डउसकीसेनापरटूटपडाजिससेसैकडोंसैनिकएवंघोडेउनकेदेशकेआहतहोकरकालकवलितहोगये।औरंगजेबकेअन्तरनेस्वीकारकियादेवालयकाप्रभाव।औरशाहीफ़रमानजारीकियाजिसकेद्वारामंदिरको५गाँवकीमाफीएवंएकविशालनक्कारखानानिर्मितकराकरप्रभुकोभेंटकियाएवंनक्कारखानाकीव्यवस्थाहेतुधनप्रतिवर्षराजकोषसेदेनेकेआदेशप्रसारितकिया।वहींनक्कार खानाआज भी मौजूदहैऔर यवन शासक कीपराजय का मूकसाक्षीहै।
इसीफरमान-नामे का नवीनीकरण उसकेपौत्रशाहआलम ने सन् 1196 फसलीकीख़रीफ़मेंदोगाँवऔरबढ़ाकरयानी 7 गाँवकरदिया।जिनमेंखड़ेरा, छवरऊ, नूरपुर, अरतौनी, रीढ़ाआदिजिसकोतत्कालीनक्षेत्रीयप्रशासक (वज़ीर) नज़फखाँबहादुरकेहस्ताक्षरसेशाहीमुहरद्वाराप्रसारितकियागया तथा स्वयं शाहआलम नेएकपृथक्सेआदेश चैतसुदी 3 संवत 1840 कोअपनीमुहरएवंहस्ताक्षरसेजारीकिया।
शाहआलमकेबादइसक्षेत्रपरसिंधियाराजवंशकाअधिकारहुआ।उन्होंनेसम्पूर्णजागीरकोयथास्थानरखाएवंपृथक्सेभोगरागमाखनमिश्रीएवंमंदिरकेरख-रखावकेलियेराजकोषसेधनदेनेकीस्वीकृतिदिनाँकभाद्रपद-वदीचौथसंवत 1845 कोगोस्वामीकल्याणदेवजीकेपौत्रगोस्वामीहंसराजजी, जगन्नाथजीकोदी।यहसारीजमींदारीआजभीमंदिरश्री दाऊजी महाराजएवंउनकेमालिककल्याणवंशज, जोकिमंदिरकेपण्डापुरोहितकहलातेहैं, उनकेअधिकारमेंहै। मुग़लकाल मेंएकविशिष्टमान्यतायहथीकिसम्पूर्ण महावन तहसीलकेसमस्तगाँवोंमेंसेश्रीदाऊजीमहाराजकेनामसेपृथक्देवस्थानखातेकी
मालगुजारीशासनद्वारावसूलकरमंदिरकोभेंटकीजातीथी, जोमुगलकालसेआजतकशाहीग्रांटकेनामसेजानीजातीहैं, सरकारीखजानेसेआजतकभीमंदिरकोप्रतिवर्षभेंटकीजातीहै।
ब्रिटिशशासन-
सके बाद फिरंगी का जमाना आया।मन्दिरसदैव सेदेश-भक्तों केजमावड़े का केन्द्र रहा।उनकी सहायता एवं शरण-स्थल का एक मान्य-स्रोतभी।जब ब्रिटिश शासन को पताचला तोउन्होंनेमन्दिरके मालिका पण्डों को आगाह किया कि वे किसी भी स्वतन्त्रताप्रेमी कोअपने यहाँ शरण न दें परन्तु आत्मीय सम्बन्ध एवं देश के स्वतन्त्रता प्रेमीमन्दिर के मालिकों ने यह हिदायत नहीं मानी, जिससेचिढ़करअंग्रेज शासकों ने मन्दिर के लिये जो जागीरें भूमि एवं व्यवस्थाएं पूर्वशाही परिवारों से प्रदत्त थी उन्हें दिनाँक 31 दिसम्बरसन् 1841 को स्पेशल कमिश्नर केआदेश से कुर्की कर जब्त कर लिया गया और मन्दिर के ऊपर पहरा बिठा दिया जिस से कोई भी स्वतन्त्रता प्रेमी मन्दिरमें नआ सके।परन्तुकिलेजैसेप्राचीरोंसेआवेष्ठितमन्दिरमेंकिसीदर्शनार्थीकोकैसेरोकलेते? अत: स्वतन्त्रतासंग्रामी दर्शनार्थीकेरूपमेंआतेतथामन्दिरमेंनिर्बाधचलनेवालेसदावर्तएवंभोजनव्यवस्थाकाआनन्दलेतेओरअपनीकार्य-विधिकासंचालनकरकेपुन: अभी ष्टस्थान को चलेजाते।अत: प्रयत्न करने के बाद भी गदर प्रेमियों को शासन न रोक पाया।
मान्यताएं-
बलदेवएकऐसातीर्थहैजिसकीमान्यताएं हिन्दू धर्मा्वलम्बीकरतेआयेहैं।धर्माचार्योंमेंश्रीमद् बल्लभाचार्य जीकेवंशकीतोबातहीपृथक्है। निम्बार्क, माध्व, गौड़ीय, रामानुज, शंकर कार्ष्णि, उदासीन आदिसमस्तधर्माचार्यो, मेंबलदेवजीकीमान्यताएंहैं।सभीनियमितरूपसेबलदेवजीकेदशनार्थपधारतेरहेहैंऔरयहक्रमआजभीजारीहै।
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इसकेसाथहीएकधक्का ब्रिटिशराज में मंदिर को तब लगा जब ग्राउस यहाँ का कलेक्टर नियुक्तहुआ।
ग्राउसमहोदयकाविचारथाकिबलदेवजैसेप्रभावशालीस्थानपरएकचर्चकानिर्माणकरायाजायक्योंकिबलदेवउससमयएकमूर्धन्यतीर्थस्थलथा।अत: उसनेमंदिरकीबिनाआज्ञाकेचर्चनिर्माणप्रारम्भकरदिया।
शाहीजमानेसेहीमंदिरकी 256 एकड़भूमिमेंमंदिरकीआज्ञाकेबगैरकोईव्यक्तिकिसीप्रकारकानिर्माणनहींकरा
सकताथा।क्योंकिउपर्युक्तभूमिकेमालिकजमींदारश्रीदाऊजीहैं।तोउनकीआज्ञाकेबिनाकोईनिर्माणकैसेहोसकताथा? परन्तुउन्मादीग्राउसमहोदयनेबिनाकोईपरवाहकियेनिर्माणकरानाशुरूकरदिया।मंदिरकेमालिकाननेउसकोबलपूर्वकध्वस्तकरादियाजिससेचिढ़-करग्राउसनेपंडावर्गएवंअन्यनिवासियोंकोभारीआतंकितकिया।तो आगरा केएकमूर्धन्यसेठएवंमहाराजमुरसानकेव्यक्तिगतप्रभावकाप्रयोगकरवायसरायसेभेंटकरग्राउसकास्थानान्तरणबुलन्दशहरकराया।जिसस्थानपरचर्चकानिर्माणकरानेकीग्राउसकीहठथीं।उसीस्थानपरआजवहाँबेसिकप्राइमरीपाठशालाहैजोपश्चिमीस्कूलकेनामसेजानीजातीहै।ग्राउसकीपराजयकामूकसाक्षीहै।
मुख्यआकर्षण-

वैसेबलदेवमेंमुख्यआकर्षणश्रीदाऊजीकामंदिरहै।किन्तुइसकेअतिरिक्तक्षीरसागरतालाबजोकिक़रीब 80 गजचौड़ा 80 गजलम्बाहै।जिसकेचारोंओरपक्केघाटबनेहुएहैंजिसमेंहमेशाजलपूरितरहताहै।उसजलमेंसदैव जैसे दूध पर मलाई होतीहै उसीप्रकार काई (शैवाल) छायी रहतीहै।दशनार्थी इससरोवर में स्नानआचमन करतेहैं,पश्चात दर्शन को जातेहैं।
पर्वोत्सव-

मन्दिरपर्वोत्सव-मन्दिरमूलत: बलभद्र सम्प्रदायीहै।किन्तुपूजार्चनमेंज़्यादा-तरप्रसावपुष्टिमार्गीयहै।वैसेवर्ष-भरकोईनकोईउत्सवहोताहीरहताहैकिन्तुमुख्यत: वर्षप्रतिपदा, चैत्रपूर्णिमाबलदेवजीकारासोत्सव अक्षयतृतीया, (चरणदर्शन) गंगादशहरा, देवशयनीएकादशी, समस्त श्रावणमास केझूलोत्सव, श्रीकृष्णजन्माष्टमी, बलदेवश्रीदाऊजीकाजन्मोत्सव (भाद्रपदशुक्ल 6) तथा राधाष्टमी, दशहरा, शरदपूर्णिमा, दीपमालिका, गोवर्धनपूजा, (अन्नकूट) यमद्वितीया तथाअन्यसमस्तकार्तिकमासकेउत्सवमार्गशीर्षपूर्णिमा (पाटोत्सव) तथामाघकी बसंतपंचमी सेप्रारम्भहोकरचैत्रकृष्ण-पंचमीतकका 1-1/2 माहका होली उत्सवप्रमुखहै।होलीमेंविशेषकरफाल्गुनशुक्ल 15 कोहोलीपूजन सम्पूर्ण हुरंगा जोकि ब्रजमंडल के होली उत्सव कामुकुटमणिहै, अत्यन्तसुरम्यएंवंदर्शनीयहैं।पंचमीकोहोलीउत्सवकेबाद 1 वर्षकेलियेइसमदन-पर्व को विदायीदीजातीहै।वैसेतोबलदेवमेंप्रतिमाहपूर्णिमाकोविशेषमेलालगताहैफिरभीविशेषकरचैत्रपूर्णिमा, शरदपूर्णिमा, मार्गशीर्षपूर्णिमाएवंदेवछटकोभारीभीड़होतीहै।इसकेअतिरिक्तवर्ष-भरहजारोंदर्शनार्थीप्रतिदिनआतेहैं।भगवान विष्णु केअवतारोंकीतिथियोंकोविशेषस्नानभोगएवंअर्चनाहोतीहैतथा 2 बारस्नानश्रृंगारएवंविशेषभोगरागकीव्यवस्थाहोतीहै।यहाँकामुख्यप्रसादमाखनएवंमिश्रीहैतथाखीरकाप्रसाद, जोकिनित्यभगवानआरोगतेहैं, प्रसिद्धहैं।
दर्शनकाक्रम-

यहाँ दर्शनकाक्रमप्राय: गर्मी में अक्षयतृतीया से हरियालीतीज तकप्रात: 6 बजेसे 12 बजेतकदोपहर 4 बजेसे 5 बजेतकएवंसायं 7 बजेसे 10 तकहोतेहैं।हरियालीतीजसेप्रात: 6 से 11 एवंदोपहर 3-4 बजेतकएवंरात्रि 6-1/2 से 9 तकहोतेहैं।
मन्दिरमेंसमय-

समयपरदर्शन, एवंउत्सवोंकेअनुरूपयहाँकीसमाजगायकीअत्यन्तप्रसिद्धहै।यहाँ कीसाँझीकला जिसकाकेन्द्र मन्दिरही हैअत्यन्त प्रसिद्धहै।
बलदेवपटेबाजीकेअखाड़ेबन्दी (जिसमें हथियार चलाना लाठीभाँजनाआदि) काबड़ाशौक़हैसमस्त मथुरा जनपदएवंपास-पड़ौसी जिलोंमें भीयहाँका `काली` का प्रदर्शनअत्यन्तउत्कृष्टकोटिकाहै।बलदेवकेमिट्टीकेबर्तनबहुतप्रसिद्धहैं।
यहाँकामुख्यप्रसादमाखनमिश्रीतथाश्रीठाकुरजीकोभाँगकाभोगलगनेसेयहाँप्रसादरूपमेंभाँगपीनेकेशौक़ीनलोगोंकीभीकमीनहीं।भाँगतैयारकरनेकेभीकितनेही
सिद्धहस्त-उस्तादहैंयहाँकीसमस्तपरम्पराओंकासंचालनआजभीमन्दिरसेहोताहै।यदिसामंतीयुगकादर्शनकरनाहोतोआजभीबलदेवमेंप्रत्यक्षहोसकताहै।आजभीमन्दिरकेघंटेएवंनक्कारखानेमेंबजनेवालीबम्बकीआवाजसेनगरकेसमस्त
व्यापारव्यवहारचलतेहैं।
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महामनामालवीयजी, पं०मोतीलालनेहरू, जवाहरलालनेहरू, मोहनदासकरमचन्दगाँधी (बापू) माताकस्तूरबा, राष्ट्रपतिडॉ०राजेन्द्रप्रसाद, राजवंशीदेवीजी, डॉ०राधाकृष्णजी, सरदारबल्लभभाईपटेल, मोरारजीदेसाई, दीनदयालजीउपाध्याय, जैसेश्रेष्ठराजनीतिज्ञ, भारतेन्दुबाबूहरिशचन्द्रजी, हरिओमजी, निरालाजी, भारतकेमुख्यन्यायाधीशजास्टिसबांग्चूके०एन०जीजैसेमहापुरुषबलदेवदर्शनार्थ
पधारतेरहेहैं।जिनकेदर्शनार्थपधारनेकेदस्तावेजआजभीसुरक्षितहैं।

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